Saturday, June 20, 2020

the world of social media

सोशल मीडिया की दुनिया
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जब मैं स्कूल में था तब दिव्य भास्कर अखबार के लिए कविता लिखता था। स्कूल में पढ़ता था और कविता के सारे नियमों के बारे में मुझे पता नहीं था। (वैसे देखा जाए तो आज भी ज्यादा कुछ पता नहीं है) फिर कुछ पत्रकार उस कविता को नियमों के हिसाब से ठीक करने की कोशिश करते और आगे भेज देते। फिर वह डिपार्टमेंट संभालने वाले पत्रकार को अगर ने कविता सही लगती तो वह आगे भेज देता। फिर अखबार के सह संपादक को अगर यह सही लगे तब जाकर वह अखबार में प्रस्तुत की जाती। आज सोशल मीडिया में ऐसा कुछ नहीं है। आप जो चाहे, जिसे चाहे, जिस तरीके से चाहे अपनी बात रख सकते हैं। यहां हर कोई पत्रकार है, मूवी क्रिटिक्स है, कवि है, लेखक है, अभिनेता है। 

मेरे कुछ दोस्त थे जो सोशल मीडिया पे आए और कुछ सोशल मीडिया में आकर दोस्त बन गए। कुछ ऐसे भी लोग थे जो सोशल मीडिया पर घंटों बहस करते लेकिन जब सामने मिलते तो दो शब्द भी ना कह पाते। स्कूल में था तब से मेरे विचार बाकी विद्यार्थियों से अलग रहे हैं, चाहे वो शिक्षा व्यवस्था हो, समाज व्यवस्था हो, राज्य व्यवस्था हो या अर्थव्यवस्था हो। धर्म की बात हो या व्यवसाय की, शादी की बात हो या समाज के बनाए हुए नियमों की बने बनाए पथ पर चलना मेरे लिए काफी मुश्किल रहा है।

 गांधी जी ने कहा है कि विचारों की भिन्नता का मतलब एक दूसरे के विरोधी होना नहीं होता है अगर ऐसा होता तो मैं और मेरी पत्नी एक दूसरे के शत्रु हो जाते। लेकिन कई बार हो सकता है कि इसी विचारों की भिन्नता के चलते मैंने कठोर शब्द का इस्तेमाल किया हो। किसी को बुरा भला भी कहा हो। मेरी लिखी हुई पोस्ट से या उस में इस्तेमाल किए गए शब्द से आपको दुख पहुंचा हो। कई बार फेक न्यूज़ भी गलती से शेयर कर दिए हो। मैं अपने विचारों पर आज भी कायम हूं लेकिन मेरा यह आग्रह कभी नहीं रहा कि लोग भी उसी विचार के साथ सहमत हो। कठोर और अनचाहे शब्द का पहला वार आप लोगों की ओर से ही आता रहा लेकिन हो सकता है प्रतिक्रिया मेरी भी गलत हो। तो जिन जिन लोगों ने मुझे गालियां दी है, मुझे अनचाहे शब्द कहे है उन सबको मैंने माफ कर दिया है और जिन लोगों को मेरे अनचाहे शब्दों से दुख हुआ है उन सबकी में इस पोस्ट के जरिए माफी मांग रहा हूं।

अब थोड़ी तो फिक्र करनी पड़ेगी।

अब थोड़ी तो फिक्र करनी पड़ेगी।
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फिलहाल इस मामले में कुछ भी कहना जल्दबाजी होगी। फिल्म क्षेत्र से जुड़े लोगों की जिंदगी अपने आप में एक शोध का विषय है। पिछली बार जब फिल्म की थी तब सेट पर 4 लोग ऐसे मिले थे जो डिप्रेशन से गुजर चुके थे। मेंटल हेल्थ के बारे में हमें ज्यादा सोचने की आवश्यकता है। आप सोचिए पढ़े लिखे समझदार , धनवान और अपने क्षेत्र में सफल नौजवान का अगर यह हाल है तो स्कूल में पढ़ रहे बच्चों का क्या हाल होता होगा ? आज भी स्कूल में AC क्लासरूम को तवज्जो दी जाती है लेकिन काउंसलर की पोस्ट को इतनी अहमियत नहीं दी जाती है। बोर्ड के रिजल्ट से पहले मैंने स्टूडेंट्स को कहा था एक बार छिछोरे देख लेना अब निशब्द हूं।

Tuesday, May 5, 2020

मजदूरों के रेल किराए का वो सच जो आपको किसी ने नहीं बताया होगा।

मजदूरों के रेल किराए का वो सच जो आपको किसी ने नहीं बताया होगा।
मजदूरों के रेल के किराए को लेकर कई सारे तर्क वितर्क हो रहे हैं। अगर आप जानना चाहते हैं कि क्या है सच और क्या है झूठ। 

शुरुआत करते हैं अंशु की लिखी हुई प्यारी सी कविता से 

सुनो..
तुम, अब गांव में ही बस जाना..
दो सूखी रोटी खाना..
पर वापस ना आना !!
हम, तुम्हें दीन-हीन,
ग़रीब, बेचारा कहते हैं ना..
खुद घरों में घुसकर,
तुम्हे सड़कों पर भूखा, पैदल छोड़ते हैं ना..
बस तुम वापस न आना !!
यकीन मानना..
यह सारे शब्द बदलेंगे..
बेचारा कौन है, हम यकीनन समझेंगे !

पहले हमारा देश जाती, धर्म और चेहरे के रंग से बटा हुआ था । लेकिन अब राजनीति सोच की वजह से भी बटा हुआ है। तो एक पार्टी के समर्थक यह कह रहे हैं कि किराया मजदूरों के पास से नहीं लिया गया है। 85% सरकार दे रही है और 15% राज्य सरकार दे रही है। तो दूसरी पार्टी के समर्थक कह रहे हैं सरकार झूठ बोल रही है यहां तक कि उन्होंने ऐलान भी कर दिया कि अगर सरकार पैसे नहीं देंगी तो हम पैसे देंगे हालांकि उन्होंने सिर्फ एलान ही किया है उनके पास भी कोई पुख्ता प्लान है या नहीं यह उन्होंने अभी तक नहीं बताया है। तो क्या सरकार सच में झूठ बोल रही है तो हम आपको बता दे जी नहीं।  सरकार सच बता रही है । तो क्या मजदूरों से कोई भी पैसा नहीं लिया जा रहा है? जी नहीं मजदूरों के पास से स्लीपर क्लास का जो किराया होता है वो लिया जा रहा है।।।। तो फिर आखिर सच क्या है यह हम आपको बताते हैं। मान लीजिए महाराष्ट्र से यूपी जाने का किराया ₹200 है तो उसका 85% यानी कि ₹170 सरकार देगी और बाकी के ₹30 राज्य सरकार को देना होगा यह हम समझ रहे हैं या फिर हमें समझाया जा रहा है लेकिन यह गलत है। 21 जून 2019 की मिंट की रिपोर्ट पढ़ते हैं तो उनमें साफ जिक्र किया हुआ है कि रेलवे का खर्चा ज्यादा हो रहा है और आमदनी कम। यानी कि लॉक डाउन से पहले भी अगर आपने ट्रेन में सफर किया होता तो आपकी जो टिकट होती है जो किराया होता है उस पर 47 प्रतिशत सब्सिडी दी जाती है। अब रेलवे का मानना है कि यह ट्रेन जब वापिस आएगी तो खाली आएगी तो यह 47 प्रतिशत का हो जाता है 85 प्रतिशत। यानी कि 200  की टिकट का मजदूरों को ₹200 ही देना होगा।  आंकड़ों के माया जाल में फंसा कर सरकार लोगों को गुमराह कर रही है। सफेद झूठ बोल रही है। भिवंडी से उत्तरप्रदेश के गोरखपुर के लिए श्रमिक स्पेशल ट्रेन चलाई गई थी. लेकिन इसमें करीब 90 सीटें खाली रह गईं। घर लौटने की आस में स्टेशन पहुंचे 100 से ज्यादा मजदूरों को वापस लौटना पड़ा क्यों की इन मजदूरों के पास टिकट खरीदने के पैसे नहीं थे। यानी कि ट्रेन खाली जाएगी तो चलेगा लेकिन मजदूरों को बिना पैसे नहीं जाने दिया जाएगा ये सरकार ने साफ कर दिया है। अब जरा यह तस्वीर भी देख लीजिए yeah Vishwanath Shinde hai जो अपनी पत्नी दो बच्चे शारीरिक रूप से दिव्यांग चाची एवम् अपनी अंधी बहन के साथ मुंबई से लेकर अकोला तक 460 किलोमीटर का सफर पैदल तय करने को मजबूर है । और कुछ ही दिन पहले हमारे पत्रकार महोदय क्या कहते थे यह भी सुन लीजिए । यह दूसरी रिपोर्ट भी देख लीजिए जहां पर महाराष्ट्र से साइकिल लेकर यूपी जा रहे मजदूरों ने मध्यप्रदेश में अपनी जान गवाई क्या इनकी मौत की कोई कीमत नहीं है क्योंकि यह मजदूर है ? आखिर कौन है इसकी मौत का जिम्मेदार ? यह पूछता है भारत लेकिन क्या सच में ही पूछता है भारत ? बड़े ही अफसोस की बात है कि झूठी वाहवाही के लिए हमारे पास दूसरे देशों को मदद करने के लिए पैसे हैं , India shining home yahan thodi Moti ho ja namaste Trump ho पैसों का जुगाड़ कहीं से भी हो जाता है लेकिन जब हमारे ही देश के श्रमिकों की बात आती है हमारे ही देश के किसानों की बात आती है हमारे ही देश के मजदूरों की बात आती है तब हमारे पास पैसे नहीं होते। आज हम जिस घर में महफूज है वह घर उन्होंने ही बनाए हैं बेशक आज आप लोगों ने बहुत पैसे कमाए होंगे लेकिन उसके लिए मेहनत इन श्रमिकों ने की हुई है यह बात आज हम भूल गए है। साहिर लुधियानवी जी ने कहा था माना कि अभी तेरे मेरे, अरमानो की कीमत कुछ भी नहीं। मिट्टी का भी है कुछ मोल मगर, इन्सानों की कीमत कुछ भी नहीं
इन्सानों की इज्जत जब झूठे, सिक्कों में न तोली जायेगी। वो सुबह कभी तो आयेगी ॥

और उसके तुरंत बाद उन्होंने कहा था

संसार के सारे मेहनतकश, खेतो से, मिलों से निकलेंगे
बेघर, बेदर, बेबस इन्सां, तारीक बिलों से निकलेंगे
दुनिया अम्न और खुशहाली के, फूलों से सजाई जायेगी। वो सुबह हमीं से आयेगी ॥ 









Thursday, April 23, 2020

अर्नब कि पत्रकारिता और कांग्रेस की राजनीति

कुछ दिन पहले ही अर्नब गोस्वामी की पत्रकारिता को लेकर मैंने अपने निजी विचार फेसबुक पोस्ट के माध्यम से रखे थे। कोलेज के दिनों में अर्नब गोस्वामी मेरा चाहिता पत्रकार हुआ करता था। आज वह मेरा चाहिता पत्रकार तो नहीं है लेकिन जिस वजह से उस पर एफ. अार. आई दर्ज करवाई जा रही है उसका हम विरोध करते है और Y कैटेगरी के सिक्योरिटी होने के बावजूद भी उस पर जो हमला हुआ उसकी भी हम कड़ी निंदा करते हैं। हमारा पहले से मानना रहा है कि विचारों की लड़ाई विचारों से लड़ी जानी चाहिए किसी भी हथियारों से नहीं। कांग्रेस को परेशानी है कि उन्होंने सोनिया गांधी पर टिप्पणी क्यों की ? जब आप नेता बनते हो और सार्वजनिक जीवन में आपका योगदान होता है खास तौर पर राजनीति में तो आप पर सवाल किए जाएंगे। कड़े से कड़े सवाल किए जाएंगे आप की गलत नीतियों पर भी सवाल होंगे और आप की चुप्पी पर भी सवाल होंगे यहां तक कि आपकी निजी जिंदगी को लेकर भी सवाल किए जाएंगे और उसके लिए हर एक राजनेता को तैयार रहना ही चाहिए। पत्रकार का यही काम होता है। अब बड़े ही अफसोस की बात है लेकिन हमें यह स्वीकार करना होगा कि हमारी राजनीति उस दौर में आकर रुकी है जहां पर कुछ पत्रकार कुछ पार्टी को सवाल करेंगे और बाकी के पत्रकार किसी और पार्टी को सवाल करेंगे। लेकिन सवाल का जवाब देने के लिए तैयार रहना होता है । कांग्रेस सवाल कर सकती है कि जब जे डी अग्रवाल हमारे सानंद स्वामी मरे थे तब अर्नब कौन से बिल में छुप कर बैठ गया था ? शामली की घटना में जहां पर कुछ मुस्लिम युवक ने एक हिंदू युवक को पुलिस वान से निकालकर मारा था। जिसके लिए अर्नब दिन रात तड़पता रहता है वह हिंदू मुस्लिम मसाला यहां पर था। समाज में नफरत और जहर फैलाने का सबसे बढ़िया मौका उसके पास था लिकिन तब वो चुप क्यों था ?  ऐसे कड़े सवाल करने का कांग्रेस के पास एक मौका था जो उसने गवा दिया। कुछ दिन पहले ही जब  गोस्वामी ने मुंबई में इकट्ठे हुए माइग्रेंट लेबर को मजबूर मजदूर ना मानते हुए उसे तफरी वाले अभिनेता कहा था तब कांग्रेस का लहू गरम नहीं हुआ ये निहायती घटिया रिपोर्टिंग थी जिस पर सवाल होने चाहिए थे लेकिन इस पर कोई राजनीति नहीं होगी क्योंकि यह मजदूर का मामला था। लेकिन सोनिया गांधी को दो सवाल क्या पूछ लिए पूरी कांग्रेस में भूकंप आ गया। जितनी घटिया अर्नब की रिपोर्टिंग है उतनी ही घटिया कांग्रेस की राजनीति  है। आज भी कांग्रेस के लिए जनता के प्रश्न से ज्यादा महत्वपूर्ण गांधी परिवार है। हम चाहते हैं कि पत्रकार जगत भी आगे आए क्योंकि ऐसी छोटी-छोटी बातों पर अगर पत्रकारों पर FIR करने लगेंगे तो फिर हमारी स्वतंत्रता का कोई मोल नहीं रहेगा।

Friday, July 20, 2018

युवाओं को साहित्य पढऩा चाहिए, क्योंकि साहित्य ही विचारों को जन्म देता है और विचार क्रांति को। बिना साहित्य के अध्ययन के अच्छा ज्ञान हासिल नहीं किया जा सकता है। अच्छा पढऩे के साथ ही हमें अच्छा सुनने की आदत को भी जीवन में शामिल करना चाहिए। ये शब्द है मेरे चहीते कवि गोपालदास नीरजजीके । आपके जाने के बाद हिंदी कविता का मंच बस यही कहेगा....

"अब न वो दर्द, न वो दिल, न वो दीवाने रहे
अब न वो साज, न वो सोज, न वो गाने रहे
साकी! अब भी यहां तू किसके लिए बैठा है
अब न वो जाम, न वो मय, न वो पैमाने रहे।"

आज हम आपको कव्यांजली देना चाहते थे लेकिन कव्यंजली तो आप हमको देके चले गए और क्या खूब लिखा आपने सर, कास इस दौर के नेता इसे समझ पाते..

"दुखते हुये जख्मों पे हवा कौन करे
इस हाल में जीने की दुआ कौन करे
बीमार हैं जब खुद ही हकीमाने वतन
फिर तेरे मरीजों की दवा कौन करे ?"

हिंदू - मुसलमां में बटा ये देश क्या कभी आपके मजहब को समाज पाएगा ?

अब तो मज़हब कोई ऐसा भी चलाया जाए।
जिसमें इंसान को इंसान बनाया जाए।

जिसकी ख़ुशबू से महक जाय पड़ोसी का भी घर
फूल इस क़िस्म का हर सिम्त खिलाया जाए।

आग बहती है यहाँ गंगा में झेलम में भी
कोई बतलाए कहाँ जाके नहाया जाए।

प्यार का ख़ून हुआ क्यों ये समझने के लिए
हर अँधेरे को उजाले में बुलाया जाए।

मेरे दुख-दर्द का तुझ पर हो असर कुछ ऐसा
मैं रहूँ भूखा तो तुझसे भी न खाया जाए।

जिस्म दो होके भी दिल एक हों अपने ऐसे
मेरा आँसू तेरी पलकों से उठाया जाए।

गीत उन्मन है, ग़ज़ल चुप है, रूबाई है दुखी
ऐसे माहौल में ‘नीरज’ को बुलाया जाए।

अलविदा नीरज जी,पर जब भी आपके गीत गुनगुनाएगे आप बहुत याद आयेंगे।

जितना कम सामान रहेगा
उतना सफ़र आसान रहेगा

जितनी भारी गठरी होगी
उतना तू हैरान रहेगा

उससे मिलना नामुमक़िन है
जब तक ख़ुद का ध्यान रहेगा

हाथ मिलें और दिल न मिलें
ऐसे में नुक़सान रहेगा

जब तक मन्दिर और मस्जिद हैं
मुश्क़िल में इन्सान रहेगा

‘नीरज’ तो कल यहाँ न होगा
उसका गीत-विधान रहेगा

Monday, November 23, 2015

Food Contamination in India

When the last tree is cut down, the last fish eaten, and the last stream poisoned, you will realize that you cannot eat money.” - Native American saying. A quote by Richard Wilkinson explains economic development as a development of more intensive ways to exploit the natural environment. We hurt the environment in many ways than we could possibly imagine. In the late 1980s when India was flush with a wave of increased consciousness on environmental issues, government agencies too exhibited bravado. The Indian Council of Medical Research, the premier body for medical research in the country, launched a pioneering study that resulted in a path breaking report in 1993. The nationwide study involved several ICMR labs in the country, many universities and research bodies. The basic findings of the report were startling and for conspiratorial reasons, the report was never formally released. It however was accessed by a few environmental groups and some journalists. Government did not acknowledge the report and the extent and problem of food contamination in India. Resent controversy of ‘Maggi’ may strike real issues of food contamination. Organic farming should not become a fad and restricted to the elite. There is need for more effective Food and Safety Standards Authority and revisiting our laws to plugs the gap to prevent contamination of food. Our production and manufacturing processes have to be sanitized for betterment of health of people and sustainable rhythmic economic development.

Wednesday, July 1, 2015

On our first date

On our first date
You love me, I love you,
You want to know what I have,
I want to know what you have,

You judging me by what gadgets I use,
I judging you by what book you read,

You judging me by my association with club,
 I judging you by your association with NGO,

You ask me about my job, I ask you about your job…….

You’re interested in my salary,
I’m interested in your expertise,

Eat, drink and me merry is your life,
Read, explore and share is my life,

You have sky, I have a sky, you wish to fly, and I wish to fly……….

You want to fly for other to see,
I want to fly to know what I could be,

You’re entirely different than me,
And I am totally different than you,
 
You’ll respect me, and I’ll respect you……….

You love me, I love you,
You want to continue,
And I want to continue,

Waiting for our second date.